सामाजिक जन जागरण का ध्रुवतारा हैं संत रविदास

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सत्य प्रकाश प्रसाद

भारत की सभ्यता-संस्कृति को संवारने तथा सुरक्षित रखने में संत-महात्माओं की भूमिका अग्रणी रही है। मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के अनेकानेक संत-महात्माओं की भूमिका समाज सुधारक और पथ प्रदर्शक की थी। भक्तिकाल के इन संतों में एक ऐसे मानववादी संत रविदास जी हुए, जिन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था, सामाजिक कुरीतिया, धर्मांन्धता, अंधविश्वास व अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज बुलन्द किया। यह कटू सत्य है कि सदियों से चली आ रही वर्ण-व्यवस्था ने मानव जाति के साथ बहुत अन्याय किया है। वर्णव्यवस्था के कारण ही जातिप्रथा का विस्तार हुआ और इसके परिणामस्वरूप समाज में विभिन्न जातियों के बीच नफरत की दीवार खड़ी होती चली गई। प्रारंभ में जो वर्णव्यवस्था कर्म पर आधारित थी वही कालांतर में जन्म आधारित बन गई।

भक्तिकाल के संत रविदास जी का जन्म पंद्रहवीं सदी में उस समय हुआ जब भारत सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक विपदाओं से जूझ रहा था। देश में सामंतवाद और जागीरदारों का बोलबाला था। मध्यकाल के इस युग को सामन्तवादियों व रुढ़िवादियों का युग कहना अनुचित न होगा क्योंकि इस युग में धार्मिक व समाजिक कुरीतियों, धर्मांन्धता, छुआ-छूत का प्रकोप पूरे समाज में बुरी तरह फैल चुकी थी। जनमानस इन कुरीतियों को ही अपने जीवन का अंग मानने लगे थे। निम्न जाति के लोगों के लिए मंदिरों में प्रवेश वर्जित था। विदेशी शासकों के द्वारा देश की धन-सम्पदा लूटी जा रही थी, धार्मिक-स्थलों को नष्ट किया जा रहा था। इतना ही नहीं लोगों को धर्म-परिवर्तन के लिए भी मजबूर किया जाता था। दलित और शाेषित वर्ग के लोगों को कर्मकाण्ड की दोहरी मार को झेलना पड़ रहा था। सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक ढ़ांचा लगभग ध्वस्त हो चुका था। इस निस्तेज मध्ययुग को स्वर्ण युग बनाने का श्रेय निःसंदेह मानवतावादी संत रविदास जी को जाता है। संत शिरोमणि कुलगुरू रविदास जी ने मध्यकाल में प्रचलित संत परंपरा का निर्वाह करते हुए तात्कालीन समाज को जाति-धर्म से ऊपर उठाने का काम किया ताकि प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सके। संत रविदास मानवतावादी प्राणधारा के उन संत कवियों में थे जिन्होंने तत्कालीन व्यवस्था से जूझते परेशान एवं हताश लोगों को सूक्ष्मता से देखा-परखा और अपने विलक्षण अपने प्रतिभा से उनका मार्गदर्शन किया। अपने काव्य और व्यंग के द्वारा समाज में फैली जाति-भेद, छुआ-छूत, धर्मांन्धता व अंधविश्वास जैसे सामाजिक कुरीतियों और विसंगतियों पर कड़ा प्रहार किया। मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए रविदास जी सदैव संघर्षरत रहे। उनका आध्यात्मिक लक्ष्य जहाॅं ‘ब्रह्मानन्द’ की प्राप्ति था वहीं सामाजिक लक्ष्य का शिखर लोक कल्याण की भावना में सन्निहित था।

रविदास जी भक्तिकाल के निर्गुण शाखा के ऐसे सिरमौर संत थे जिन्होंने तात्कालीन समाज में व्याप्त अनेकानेक रुढ़ियों, परम्पराओं तथा सामाजिक कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया, इस सामाजिक प्रकोप को जड़ से समाप्त करने के लिए उन्होंने विभिन्न धर्मों, जातियों और सम्प्रदायों में समन्वय स्थापित कर ज्ञान की कसौटी के आधार पर इसे मिथ्या सिद्ध किया। संतकवि रविदास जी ने मानवीय मूल्यों की पक्षधरता करते हुए जन-जन में निर्गुण भक्ति का संचार किया। संत कवि की वाणी समाज के सभी वर्गों को एक ही प्रभू की संतान मानकर एक दूसरे से सदाचार का उपदेश देती है। संत रविदास की कविता समाज और धर्म के ठेकेदारों द्वारा निम्न जाति के लोगों के लिए बंद किये दरवाजों को पीटकर उसे प्रश्न करने का साहस देती है। उस युग में काव्यरचना इस लालच से की जाती थी कि किसी शासक का संरक्षण प्राप्त हो सके। परन्तु रविदास जैसे क्रांतिकारी संतकवि ने मानव जीवन की बेहतरी के अलावा ना कोई सपना देखा न कोई समझौता किया। गुरू रविदास जी समूची विश्व-चेतना को एकाकार करने का स्वप्न देखते थे। वे अपने काव्य के माध्यम से कहते हैं कि प्रभू ही सबके स्वामी हैं, यह सारा संसार उन्ही की देन है। हम सब एक ही माटी के भांडे हैं।

 

एकै माटी के सभ भांडेसभ का एकौ सिरजनहार।

रविदास व्यापै एकै घट भीतरसभ कौ एकै घड़ै कुम्हार।।

 

निर्गुण भक्ति के माध्यम से अध्यात्म को साधने वाले संत रविदास जी कर्म के प्रति भी घोर निष्ठावान थे। कर्मयोगी संत रविदास जी जूते सिलने के अपने पैतृक व्यवसाय को अपनाकर अपनी आजीवका चलाते रहे। उन्हें अपने व्यवसाय के साथ-साथ अध्यात्म में भी रूचि थी। व्यवसाय से वक्त निकालकर अपने शिष्यों और अन्य भक्त प्रेमियों के साथ नियमित रूप से सत्संग करना उनके दिनचर्या का अंग बन गया था। एक दिन कुछ शिष्यों ने उनसे कहा कि वे जूते सिलने का काम छोड़ दें क्योंकि भक्ति के साथ यह कार्य उचित नहीं लगता। रैदास जी ने शिष्यों को समझाते हुए कहाः ‘प्रभू ने तो मुझसे नहीं कहा कि मैं जूते सिलना बंद कर दूं। पता है कितने लोग मेरे हाथ के बने जूते पसंद करते हैं। जो भी जूते पहनता है वह राम ही तो है। कितने राम मेरे बनाए जूतों की तारीफ करते हैं। जब तक प्रभु की यही इच्छा है, मैं यह काम करता रहॅूगा’। संत रविदास अपने औजारों से केवल जूतों की ही मरम्मत नहीं करते थे। उनके पास प्रभू की कृपा से दिव्य औजार थे। अज्ञानी मनुष्य को सुधारने के लिए वे इन्हीं दिव्य साधनों का प्रयोग करते थे। संत रविदास जी ने आध्यात्म और पूजा-पाठ के लिए निर्गुण भक्ति का सहारा लेते हुए अत्यन्त सहज विधि का वर्णन किया हैः-

 

मन ही पूजा मन ही धूप । मन ही सेऊं सहज सरुप।

पूजा अरचा न जानूं तेरी। कह रैदास’ कवन गति मेरी।।

 

तात्कालीन परिस्थिति ही ऐसी थी कि हर भक्त के लिए पूजा-अर्चना करने अथवा मंदिर जाने की स्वीकृति नहीं थी। अतः गुरू रविदास का निर्गुण मार्ग हर वर्ग के लिए उपयुक्त लगा। संत रविदास और संत कबीर समकालीन माने जाते हैं दोनों ही निर्गुण शाखा के संत थे। संभवतः दोनों के गुरू स्वामी रामानन्द जी ही थे। गुरू रविदास के प्रमुख शिष्यों में चित्तौड़ की झाली रानी और मेवाड़ की राजवधू कृष्णभक्त मीरा थी। श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त मीरा ने कहा है कि बिना गुरू भक्ति नहीं की जा सकती है। मीरा संत रविदास जी के विलक्षण प्रतिभा और उनके निर्गुण भक्ति से अत्यन्त प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरू मान लिया। स्वयं मीरा के पद से पता चलता है कि उनके गुरू संत रविदास जी थे। ‘गुरू मिलिया रैदास दीन्हीं ज्ञान की गुटकी’।

 

संतकवि रविदास जी की काव्य रचना समाजिक एकता, धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता के भाव से परिपूर्ण है कि वह समाज के लिए आज भी पथ प्रदर्शक व आकाश दीप बना हुआ है। संत रविदास जी का व्यक्तित्व इतना विराट और व्यापक है कि इसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। उनके दर्शन में वह सबकुछ है जो मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। उनकी वाणी सच्चे धर्म के स्वरूप को अपने में समेटे हुए हैं। ढेर सारे मत-मतांतर, पाखंड, छल, भ्रम, झूठी मान्यता तथा अंधविश्वास से ग्रसित समाज के लिए संत रविदास की काव्य रचना और उनका दर्शन एकमात्र आश्रय नजर आता हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित किया कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित सत्कर्म एवं सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाते हैं। उनका स्पष्ट मानना था कि मनुष्य, मनुष्य से तब तक नहीं जुड़ सकेगा जबतक उनके बीच से जाति की भावना समाप्त नहीं हो जाती।

 

जाति-जाति में जाति है जो केतन के पात।

रैदास मनुष्य ना जुड़ सकेजब तक जाति ना जात।।

 

संत रविदास, संत कबीर एवं बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेदकर के साहित्य एवं जीवन के गहन अध्ययन से एक क्रांतिकारी तथ्य उभरकर सामने आता है कि तत्कालीन समय में इन महापुरूषों ने दलितों, पिछड़ों और शोषितों के उत्थान की जबरदस्त वकालत की, जिसका प्रभाव आज भी सत्य रूप में समाज में दिखाई देता है। संत शिरोमणि रविदास उन महान संतों में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोकवाणी का अद्भूत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। संत रविदास जी के कुछ पद गुरूग्रंथ साहब में भी संकलित है। उनकी वाणी ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है जो जनमानस को अपनी ओर खींचती है। संत शि​रोमणि रविदास जी की प्रासंगिकता समाज में कायम है एवं वर्तमान परिस्थितियों में उनका उपदेश समाज कल्याण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है।

 

(लेखक एक शोधकर्ता हैं)

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